Who Was Chanakya? चाणक्य कौन थे ?
चाणक्य को भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अगर हम उन के द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते है तो हमे बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है। भारतीय समाज में उन्हें बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त है। उनके जीवन के अनेक बाते हमारे मन में प्रेरणा का स्त्रोत भर्ती है।
आचार्य चाणक्य एक महान राजनीतिज्ञ,समाजशास्त्री,दार्शनिक एवं कूटनीति में निपुर्ण थे।वे एक निर्धन व्यक्ति के घर में पैदा होते हुए भी एक शक्ति शाली साम्राज्य के प्रधान मंत्री बने ऐसे महान पुरुष के जीवन के बारे में आज में आप सभी लोगो बताना चाहता हूं।
आचार्य चाणक्य जी का जन्म अनुमानित 375 ई पूर्व में पाटलिपुत्र में हुआ था।उन के बचपन का नाम विष्णुगुप्त था।उन के अन्य नाम थे कौटिल्य तथा विष्णुगुप्त । उनके पिता का नाम ऋषि कनाक और माता जी का नाम चनेश्वरी देवी था।
चाणक्य बचपन से ही अत्यधिक कुशाग्र बुद्धि वाले बालक थे।उनकी आरंभिक शिक्षा उनके पिता जी के मार्गदर्शन से पूरी हुई।उसके बाद उन्होंने अपनी शिक्षा तक्षशिला विश्वविद्यालय से पूरी की। उन्होंने यहां से राजनीतिक शास्त्र,समाजशास्त्र और दर्शन शास्त्र आदि विषयो में नीपुर्णता प्राप्त की।इसके बाद वे वहीं पर अध्यापन कार्य करने लगे।
उन के द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ था 'अर्थशास्त्र 'है।बचपन में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब चाणक्य छोटे थे तब उनके पिता की मगध के राजा महापद्मनंद ने उनकी हत्या कर दी क्युकी महापद्मनंद एक अत्याचारी शासक था और उस के खिलाफ चाणक्य के पिता जी ने आवाज उठाई थी।इस कारण उस ने उनके पिता को मार डाला।
चाणक्य जी जब तक्षशिला विश्वविद्याल में अध्यापन कार्य कर रहे थे तब भारत के उत्तर पश्चिम भाग पर युनानियो ने आक्रमण करने शुरू कर दिए जिन का नेतृत्व स्वयं सिकंदर महान कर रहा था। आचार्य चाणक्य देश भक्त थे वे अपने देश को विदेशियों के अधीन नहीं देखना चाहते थे। इस कारण वे मदत के लिए मगध गए जो कि उस समय भारत का सब से शक्तिशाली राज्य था।
धनानंद मगध का शासक था जो की आचार्य चाणक्य का समकालीन शासक था। धनानंद को धन को एकत्रित करना बहुत पसंद था। इसी कारण उसने अपनी प्रजा पर अनावश्यक कर लगा रखे थे।वह बहुत अत्याचारी और विलासी शासक था।जिस कारण वह अपनी प्रजा कि नजरो में काफी अलोकिप्रिय शासक था।
उसे अपने राष्ट्र पर आ रहे खतरे का कोई भय ना था। जब आचार्य चाणक्य धनानंद से इस बात पर मदत माग्ने आए तब धनानंद ने आचार्य चाणक्य का अपमान किया और उन्हें यह कहा कि पंडित को राजपाठ के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कई इतिहासकार मानते है कि चाणक्य की शक्ल बदसूरत थी जिसे देखकर धनानंद क्रोधित हो गए और उन्होंने उनका अपमान किया और उन्हें धका दिया जिस कारण उन की शिक्षा( चोटी) खुल गई। इस बात से आचार्य चाणक्य जी को अत्यधिक क्रोध आया और उन्होंने यह प्रतिज्ञा ली की जब तक नंद वश का नाश कर के उस के स्थान पर एक योग्य शासक ना बिठा लू तब तक में अपनी यह शिखा नहीं बाधुगा। इस घटना के बाद चाणक्य जी किसी योग्य शिष्य की तलाश करने लगे।
चाणक्य जब किसी योग्य बालक कि तलाश में थे जो कि मगध पर शासन कर सके तब एक दिन जब वे एक जंगल से गुजर रहे थे तब उन्होंने कुछ लड़कों को देखा जो कि राजसी खेल खेल रहे थे उस में एक बालक राजा बना हुआ था। उस बालक की प्रतिभा को देख कर आचार्य चाणक्य काफी प्रभावित हुए और उन्होंने उस बालक को उस के पालक पिता से रुपए देकर खरीद दिया। यह बालक कोई और नहीं था बल्कि भारत वर्ष का प्रथम महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य था जिस ने लगभग सम्पूर्ण भारत को विजिट किया।
आचार्य चाणक्य उस बालक को अपने साथ तक्षशिला विश्वविद्याल ले गए। वहा पर चाणक्य जी ने चन्द्रगुप्त मौर्य को लगभग सभी विषयो में शिक्षा प्रदान की जिस के कारण वे हर क्षेत्र में निपूर्ण हो गए।
जब चन्द्रगुप्त मौर्य को चाणक्य जी ने हर क्षेत्र में निपूर्ण कर दिया तो इसके बाद उन्होंने आस पास के लोगो को धनानंद के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। उन्होंने आदिवासियों से भी इस काम के लिए सहायता मांगी।उसके बाद उन्होंने धनानंद की राजधानी के उपर हमला कर दिया। इतिहासकारों का मानना है कि उन्हें अपने पहले आक्रमण पर बुरी तरह पराजित होना पड़ा।चन्द्रगुप्त और चाणक्य बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर युद्ध क्षेत्र से भागे। रास्ते में उन्होंने एक घर में शरण ली। यहां पर एक आश्चर्य जनक घटना हुई जिस ने चन्द्रगुप्त और चाणक्य कि आखे खोल कर रख दी।
हुआ यूं कि जब उस घर में एक बच्चा खाना खा रहा था तो उसने उबलती हुई खिचड़ी के बीचों बीच हाथ डाल दिया जिस के कारण उस का हाथ जल गया तब उसकी मां ने उसे समझाया की तू तो चाणक्य और चन्द्रगुप्त की तरह मूर्ख है जो कि बिना सीमावर्ती इलाकों को जीते बिना सीधे मगध पर आक्रमण करने चले गए। ऐसा सुन कर चाणक्य को अपनी गलती पर पश्चाताप हुआ और। उन्होंने एक बार फिर एक सेना तैयार की और आस पास के राज्यो को जितना उन्होंने आरंभ कर दिया।उन्होंने थोड़े से समय में ही पंजाब पंजाब को जीत लिया।
इसके बाद उन्होंने अपने सेना में सैनिकों की संख्या को बढ़ाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते उन्होंने धनानंद से भी बड़ी सेना तैयार कर दी।
लगभग 321 ई पूर्व में चाणक्य जी के मार्गदर्शन से चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध पर आक्रमण कर दिया और इस बार चन्द्रगुप्त विजई हुआ।इस युद्ध में धनानंद सहित उस के परिवार के सारे सदस्यों की मृत्यु हो गई।
इस प्रकार आचार्य चाणक्य जी ने अपने अपमान का धनानंद से बदला लिया।
चाणक्य जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक ग्रंथों की रचना की। उनके द्वारा लिखित प्रमुख ग्रंथ था ' अर्थशास्त्र '। इस ग्रंथ की तुलना मैक्यावली कि ' the prince' से की जाती है।
चाणक्य का अर्थशास्त्र मौर्य कालीन इतिहास को जानने का हमारा प्रमुख स्रोत है।चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधान मंत्री था, इसीलिए उसकी पुस्तक से हमें मौर्यकाल की राजनीतिक व्यवस्था के बारे में महत्वपूर्ण जान कारी प्राप्त होती है।अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीति और राज्य के राज्य प्रबंध को चलने वाली अपनी तरह की पहली पुस्तक थी।
यह पुस्तक हमें यह बताती है कि एक राजा को अपने राज्य को किस तरह चलना चाहिए। उसके अपनी प्रजा के प्रति क्या क्या कर्तव्य होने चाहिए।
यह पुस्तक हमें यह बताती है कि राजा को कैसे मंत्री नियुक्त करने चाहिए। चाणक्य के अनुसार राजा को केवल योग्य मंत्रियो को ही नियुक्त करना चाहिए। उसका मानना था कि राजा निरंकुश होना चाहिए। उसे कानून बनने का अधिकार होना चाहिए। वह कानून बनाते समय मंत्रियो से परामर्श भी के सकता है।
यह पुस्तक उस समय की गुप्तचर व्यवस्था के बारे में भी हमें जानकारी उपलब्ध करवाती है।चाणक्य ने स्थान स्थान पर गुप्तचरों को नियुक्त किया हुआ था। चाणक्य पुरुष गुप्तचरों की अपेक्षा महिला गुप्तचरों को नियुक्त किया करते थे। क्युकी उनकी मानना था कि किसी भी व्यक्ति की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा अच्छे तरीके से जानकारियां उपलब्ध करवाती है।
चाणक्य की मृत्यु के हुई यह आज भी एक पहेली बनी हुई है। उनकी मृत्यु 283 ई पूर्व में हुई थी।उनकी मृत्यु के पीछे दो प्रमुख कहानियां प्रचलित है। ये दो कहानियां इस प्रकार से है -
पहली कहानी
कहते है कि चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु के पश्चात आचार्य चाणक्य बिन्दुसार के राज पाठ में उनका सहयोग देने लगे।चाणक्य जी की बिन्दुसार जी के साथ गहरी मित्रता थी और वे आचार्य कि हर बात का पालन करते थे। इस बात से बिन्दुसार के अन्य मंत्री आचार्य से घृणा करने लगे। इन्हीं मंत्रियो में से एक मंत्री का नाम था सुबंधू।
उसने बिन्दुसार के मन में आचार्य चाणक्य के प्रति नफरत पैदा कर दी और धीरे धीरे उन में दूरियां होना शुरू हो गई।उसने बिंदुसार को यह भी बताया कि उसकी माता ' दुर्धरा ' की मौत के पीछे चाणक्य का हाथ था।
ऐसा सन कर बिन्दुसार ने चाणक्य को राजमहल से सदा के लिए चले जाने को कहा ।चाणक्य इस के बाद जंगलों में चले गए।
परन्तु जब बिन्दुसार को राजसी दाई के द्वारा यह बात पता चली कि चाणक्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को हर रोज थोड़ी थोड़ी मात्रा में उनके भोजन में विष देते थे ताकि कोई शत्रु उन्हें जहर देकर मार ना सके। परन्तु एक दिन रानी दूर्धरा ने चन्द्रगुप्त मौर्य का विष युक्त भोजन खा लिया और वे उस समय गर्भवती थी। भोजन खा कर उनकी तबीयत बिगड़ गई । चाणक्य यह बात जानते थे कि रानी अब नहीं बचेगी। परन्तु उन्होंने किसी तरह रानी के पुत्र को बचा दिया।
तब बिन्दुसार को इस बात का पता चला की वह गलत थे। अगर चाणक्य जी नहीं होते तो आज वे इस दुनिया में नहीं होते।
इस के बाद उन्होंने चाणक्य जी को वापिस राजमहल आने का निमंत्रण दिया परन्तु आचार्य जी नहीं आए और यही पर निरंतर उपवास करने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
दूसरी कहानी
दूसरी कहानी के अनुसार चाणक्य जी को बिन्दुसार के मंत्री सुबंधु ने आग लगा कर मारा था। क्युकी सूबंधु आचार्य चाणक्य से नफरत करता था।इस कारण उस ने आचार्य चाणक्य को आग लगा कर मार डाला।
इस कहानी पर विश्वास किया जा सकता है क्युकी आचार्य राजमहल से दूर अपनी घास से बनी हुई झोपड़ी में रहा करते थे। इस कारण उन्हे मारना सूबंधु के लिए आसान हो गया।
आचार्य चाणक्य एक महान राजनीतिज्ञ,समाजशास्त्री,दार्शनिक एवं कूटनीति में निपुर्ण थे।वे एक निर्धन व्यक्ति के घर में पैदा होते हुए भी एक शक्ति शाली साम्राज्य के प्रधान मंत्री बने ऐसे महान पुरुष के जीवन के बारे में आज में आप सभी लोगो बताना चाहता हूं।
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| चाणक्य |
चाणक्य का जीवन परिचय - Biography Of Chanakya
1) चाणक्य का जन्म और शिक्षा
आचार्य चाणक्य जी का जन्म अनुमानित 375 ई पूर्व में पाटलिपुत्र में हुआ था।उन के बचपन का नाम विष्णुगुप्त था।उन के अन्य नाम थे कौटिल्य तथा विष्णुगुप्त । उनके पिता का नाम ऋषि कनाक और माता जी का नाम चनेश्वरी देवी था।
चाणक्य बचपन से ही अत्यधिक कुशाग्र बुद्धि वाले बालक थे।उनकी आरंभिक शिक्षा उनके पिता जी के मार्गदर्शन से पूरी हुई।उसके बाद उन्होंने अपनी शिक्षा तक्षशिला विश्वविद्यालय से पूरी की। उन्होंने यहां से राजनीतिक शास्त्र,समाजशास्त्र और दर्शन शास्त्र आदि विषयो में नीपुर्णता प्राप्त की।इसके बाद वे वहीं पर अध्यापन कार्य करने लगे।
उन के द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ था 'अर्थशास्त्र 'है।बचपन में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब चाणक्य छोटे थे तब उनके पिता की मगध के राजा महापद्मनंद ने उनकी हत्या कर दी क्युकी महापद्मनंद एक अत्याचारी शासक था और उस के खिलाफ चाणक्य के पिता जी ने आवाज उठाई थी।इस कारण उस ने उनके पिता को मार डाला।
धनानंद के द्वारा चाणक्य जी का अपमान करना और नंद वंश के नाश की शपथ लेना
चाणक्य जी जब तक्षशिला विश्वविद्याल में अध्यापन कार्य कर रहे थे तब भारत के उत्तर पश्चिम भाग पर युनानियो ने आक्रमण करने शुरू कर दिए जिन का नेतृत्व स्वयं सिकंदर महान कर रहा था। आचार्य चाणक्य देश भक्त थे वे अपने देश को विदेशियों के अधीन नहीं देखना चाहते थे। इस कारण वे मदत के लिए मगध गए जो कि उस समय भारत का सब से शक्तिशाली राज्य था।
धनानंद
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| धनानंद |
धनानंद मगध का शासक था जो की आचार्य चाणक्य का समकालीन शासक था। धनानंद को धन को एकत्रित करना बहुत पसंद था। इसी कारण उसने अपनी प्रजा पर अनावश्यक कर लगा रखे थे।वह बहुत अत्याचारी और विलासी शासक था।जिस कारण वह अपनी प्रजा कि नजरो में काफी अलोकिप्रिय शासक था।
उसे अपने राष्ट्र पर आ रहे खतरे का कोई भय ना था। जब आचार्य चाणक्य धनानंद से इस बात पर मदत माग्ने आए तब धनानंद ने आचार्य चाणक्य का अपमान किया और उन्हें यह कहा कि पंडित को राजपाठ के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कई इतिहासकार मानते है कि चाणक्य की शक्ल बदसूरत थी जिसे देखकर धनानंद क्रोधित हो गए और उन्होंने उनका अपमान किया और उन्हें धका दिया जिस कारण उन की शिक्षा( चोटी) खुल गई। इस बात से आचार्य चाणक्य जी को अत्यधिक क्रोध आया और उन्होंने यह प्रतिज्ञा ली की जब तक नंद वश का नाश कर के उस के स्थान पर एक योग्य शासक ना बिठा लू तब तक में अपनी यह शिखा नहीं बाधुगा। इस घटना के बाद चाणक्य जी किसी योग्य शिष्य की तलाश करने लगे।
आचार्य चाणक्य की चन्द्रगुप्त मौर्य से भेट
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| चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य |
चाणक्य जब किसी योग्य बालक कि तलाश में थे जो कि मगध पर शासन कर सके तब एक दिन जब वे एक जंगल से गुजर रहे थे तब उन्होंने कुछ लड़कों को देखा जो कि राजसी खेल खेल रहे थे उस में एक बालक राजा बना हुआ था। उस बालक की प्रतिभा को देख कर आचार्य चाणक्य काफी प्रभावित हुए और उन्होंने उस बालक को उस के पालक पिता से रुपए देकर खरीद दिया। यह बालक कोई और नहीं था बल्कि भारत वर्ष का प्रथम महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य था जिस ने लगभग सम्पूर्ण भारत को विजिट किया।
आचार्य चाणक्य उस बालक को अपने साथ तक्षशिला विश्वविद्याल ले गए। वहा पर चाणक्य जी ने चन्द्रगुप्त मौर्य को लगभग सभी विषयो में शिक्षा प्रदान की जिस के कारण वे हर क्षेत्र में निपूर्ण हो गए।
धनानंद से अपने अपमान का बदला लेना
जब चन्द्रगुप्त मौर्य को चाणक्य जी ने हर क्षेत्र में निपूर्ण कर दिया तो इसके बाद उन्होंने आस पास के लोगो को धनानंद के खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। उन्होंने आदिवासियों से भी इस काम के लिए सहायता मांगी।उसके बाद उन्होंने धनानंद की राजधानी के उपर हमला कर दिया। इतिहासकारों का मानना है कि उन्हें अपने पहले आक्रमण पर बुरी तरह पराजित होना पड़ा।चन्द्रगुप्त और चाणक्य बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर युद्ध क्षेत्र से भागे। रास्ते में उन्होंने एक घर में शरण ली। यहां पर एक आश्चर्य जनक घटना हुई जिस ने चन्द्रगुप्त और चाणक्य कि आखे खोल कर रख दी।
हुआ यूं कि जब उस घर में एक बच्चा खाना खा रहा था तो उसने उबलती हुई खिचड़ी के बीचों बीच हाथ डाल दिया जिस के कारण उस का हाथ जल गया तब उसकी मां ने उसे समझाया की तू तो चाणक्य और चन्द्रगुप्त की तरह मूर्ख है जो कि बिना सीमावर्ती इलाकों को जीते बिना सीधे मगध पर आक्रमण करने चले गए। ऐसा सुन कर चाणक्य को अपनी गलती पर पश्चाताप हुआ और। उन्होंने एक बार फिर एक सेना तैयार की और आस पास के राज्यो को जितना उन्होंने आरंभ कर दिया।उन्होंने थोड़े से समय में ही पंजाब पंजाब को जीत लिया।
इसके बाद उन्होंने अपने सेना में सैनिकों की संख्या को बढ़ाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते उन्होंने धनानंद से भी बड़ी सेना तैयार कर दी।
लगभग 321 ई पूर्व में चाणक्य जी के मार्गदर्शन से चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध पर आक्रमण कर दिया और इस बार चन्द्रगुप्त विजई हुआ।इस युद्ध में धनानंद सहित उस के परिवार के सारे सदस्यों की मृत्यु हो गई।
इस प्रकार आचार्य चाणक्य जी ने अपने अपमान का धनानंद से बदला लिया।
चाणक्य जी की रचनाएं
चाणक्य जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक ग्रंथों की रचना की। उनके द्वारा लिखित प्रमुख ग्रंथ था ' अर्थशास्त्र '। इस ग्रंथ की तुलना मैक्यावली कि ' the prince' से की जाती है।
चाणक्य का अर्थशास्त्र मौर्य कालीन इतिहास को जानने का हमारा प्रमुख स्रोत है।चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधान मंत्री था, इसीलिए उसकी पुस्तक से हमें मौर्यकाल की राजनीतिक व्यवस्था के बारे में महत्वपूर्ण जान कारी प्राप्त होती है।अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीति और राज्य के राज्य प्रबंध को चलने वाली अपनी तरह की पहली पुस्तक थी।
यह पुस्तक हमें यह बताती है कि एक राजा को अपने राज्य को किस तरह चलना चाहिए। उसके अपनी प्रजा के प्रति क्या क्या कर्तव्य होने चाहिए।
यह पुस्तक हमें यह बताती है कि राजा को कैसे मंत्री नियुक्त करने चाहिए। चाणक्य के अनुसार राजा को केवल योग्य मंत्रियो को ही नियुक्त करना चाहिए। उसका मानना था कि राजा निरंकुश होना चाहिए। उसे कानून बनने का अधिकार होना चाहिए। वह कानून बनाते समय मंत्रियो से परामर्श भी के सकता है।
यह पुस्तक उस समय की गुप्तचर व्यवस्था के बारे में भी हमें जानकारी उपलब्ध करवाती है।चाणक्य ने स्थान स्थान पर गुप्तचरों को नियुक्त किया हुआ था। चाणक्य पुरुष गुप्तचरों की अपेक्षा महिला गुप्तचरों को नियुक्त किया करते थे। क्युकी उनकी मानना था कि किसी भी व्यक्ति की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा अच्छे तरीके से जानकारियां उपलब्ध करवाती है।
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| चाणक्य की प्रमुख रचनाएं |
चाणक्य की मृत्यु
चाणक्य की मृत्यु के हुई यह आज भी एक पहेली बनी हुई है। उनकी मृत्यु 283 ई पूर्व में हुई थी।उनकी मृत्यु के पीछे दो प्रमुख कहानियां प्रचलित है। ये दो कहानियां इस प्रकार से है -
पहली कहानी
कहते है कि चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु के पश्चात आचार्य चाणक्य बिन्दुसार के राज पाठ में उनका सहयोग देने लगे।चाणक्य जी की बिन्दुसार जी के साथ गहरी मित्रता थी और वे आचार्य कि हर बात का पालन करते थे। इस बात से बिन्दुसार के अन्य मंत्री आचार्य से घृणा करने लगे। इन्हीं मंत्रियो में से एक मंत्री का नाम था सुबंधू।
उसने बिन्दुसार के मन में आचार्य चाणक्य के प्रति नफरत पैदा कर दी और धीरे धीरे उन में दूरियां होना शुरू हो गई।उसने बिंदुसार को यह भी बताया कि उसकी माता ' दुर्धरा ' की मौत के पीछे चाणक्य का हाथ था।
ऐसा सन कर बिन्दुसार ने चाणक्य को राजमहल से सदा के लिए चले जाने को कहा ।चाणक्य इस के बाद जंगलों में चले गए।
परन्तु जब बिन्दुसार को राजसी दाई के द्वारा यह बात पता चली कि चाणक्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को हर रोज थोड़ी थोड़ी मात्रा में उनके भोजन में विष देते थे ताकि कोई शत्रु उन्हें जहर देकर मार ना सके। परन्तु एक दिन रानी दूर्धरा ने चन्द्रगुप्त मौर्य का विष युक्त भोजन खा लिया और वे उस समय गर्भवती थी। भोजन खा कर उनकी तबीयत बिगड़ गई । चाणक्य यह बात जानते थे कि रानी अब नहीं बचेगी। परन्तु उन्होंने किसी तरह रानी के पुत्र को बचा दिया।
तब बिन्दुसार को इस बात का पता चला की वह गलत थे। अगर चाणक्य जी नहीं होते तो आज वे इस दुनिया में नहीं होते।
इस के बाद उन्होंने चाणक्य जी को वापिस राजमहल आने का निमंत्रण दिया परन्तु आचार्य जी नहीं आए और यही पर निरंतर उपवास करने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
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| चाणक्य की मृत्यु |
दूसरी कहानी
दूसरी कहानी के अनुसार चाणक्य जी को बिन्दुसार के मंत्री सुबंधु ने आग लगा कर मारा था। क्युकी सूबंधु आचार्य चाणक्य से नफरत करता था।इस कारण उस ने आचार्य चाणक्य को आग लगा कर मार डाला।
इस कहानी पर विश्वास किया जा सकता है क्युकी आचार्य राजमहल से दूर अपनी घास से बनी हुई झोपड़ी में रहा करते थे। इस कारण उन्हे मारना सूबंधु के लिए आसान हो गया।





Nice one
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