Chandragupta Maurya। चन्द्रगुप्त मौर्य
जब भी हम अपने इतिहास को झाक कर देखते है तो हमें कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त होती है। ऐसा ही एक राजवंश था जो कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में उत्पन हुआ था। इस राजवंश का नाम था मौर्य। इस वंश का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्यजी थे।उसने इस वंश कि स्थापना 325 ई पूर्व में कि थी। उन्होंने 325 से 298 ई पूर्व तक शासन किया । उस के बाद उनके पुत्र बिन्दुसार जी राजगद्दी पर बैठे उन्होंने 298 से लेकर 273 ई पूर्व तक शासन किया। बिन्दुसार के बाद इस वंश का अगला शासक अशोक बना। जो कि इस वंश का ही नहीं बल्कि दुनिया के महान शासको में गिना जाता है।उन्होंने 269 से लेकर 232 ई पूर्व तक शासन किया। अशोक के बाद अनेक शासक बने परन्तु वे सभी अयोग्य प्रमाणित हुए।जिस कारण वे इस राज वंश को सत्रुओ से नहीं बचा सके। इस वंश का अंतिम शासक वृहद्रत था। इस वंश के शासकों ने पहली बार भारत को एक छत्र करने का प्रयत्न किया जिस में वे सफल भी रहे। इस महान राजवंश का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के बारे में हम जानेंगे।
चन्द्रगुप्त मौर्य की गणना भारत के सब से महत्वपूर्ण शासकों में से कि जाती है। यह प्राचीन भारत के एक ऐसे शासक थे जो कि पूरे भारत को एक छत्र शासन के अधीन करना चाहते थे। वे एक महान व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे। वे एक ऐसे शासक थे जो भारत से विदेशी सत्ता का दमन करना चाहते थे।
सिकंदर के आक्रमणों के बाद भारत में राजनीतिक उथल पुथल हुई,जिस के कारण समाज से अराजकता फैल गई। हर तरफ लूट मार का वातावरण उत्पन हो गया। देश वासियों में राष्ट्रीयता की भावना में कमी आई।इसी युग में एक राज वंश की उत्पति हुई जो कि आगे चल कर एक साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ और इस राजवंश का नाम था मौर्य वंश। इस वंश के संस्थापक थे चन्द्रगुप्त मौर्य। परन्तु दुर्भाग्य से चन्द्रगुप्त मौर्य के आरंभिक जीवन के बारे में हमें बहुत थोड़ा ही मालूम है। एक विचार है की चन्द्रगुप्त मौर्य जी मगध के शासक के राजकुमार थे और उनकी माता जी का नाम मुरा था जो कि नीच जाति से संबंधित थी।परन्तु अनेक आधुनिक इतिहासकार उन्हें क्षत्रिय मानते थे।बिन्दुसार तथा अशोक अपने आप को क्षत्रिय कहा करते थे इस प्रकार कहा जा सकता है की चन्द्रगुप्त मौर्य क्षत्रिय था।बौद्ध साहित्य और परंपराओं के अनुसार चन्द्रगुप्त का संबंध सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंश ' मोरिया ' से संबंधित है।जिसका नाम बाद म जा कर के मौर्य पड़ा। इस राजवंश पर किसी अन्य काबिले ने आक्रमण कर दिया और युद्ध में चन्द्रगुप्त के पिता मारे गए ।इसी कारण उनकी माता भाग गई और पाटलिपुत्र में आकर बसने लगी। चन्द्रगुप्त इस समय अपनी माता के गर्भ में था।उसके जन्म के समय ही उसका उसकी माता से विछोह हो गया। बाद में चन्द्रगुप्त एक ग्वाले के पास रहने लगा और बाद में उस ग्वाले ने उस बालक को एक शिकारी को बेच दिया।
एक दिन चन्द्रगुप्त और उसके साथी जंगल में राजसी खेल खेल रहे थे और वहां पर चाणक्य उन बच्चो को देख रहे थे। चाणक्य चन्द्रगुप्त की प्रतिभा को देख कर हैरान रह गए और उन्होंने चन्द्रगुप्त को उस शिकारी से पैसे देकर मुक्त करवा दिया।
चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय का एक ब्राह्मण था।वह अपने समय का बहुत बड़ा विद्वान था। एक बार वह धनानंद की राजधानी पाटलिुपुत्र में चला गया क्युकी वहा पर धनानंद ब्राह्मणों को धन दे रहा था। चाणक्य वहा पर सबसे आगे वाले स्थान पर बैठ गया। परन्तु धनानंद उस ब्राह्मण के करूप चेहरे को देख कर क्रोधित हो गए और उन्होंने आचार्य चाणक्य को वहा से उठा दिया। इस बात से आचार्य चाणक्य क्रोध में आ गए और उन्होंने इस वंश का अंत करने का प्रण ने लिए। इस काम। के लिए उन्हें एक प्रतिभाशाली बालक कि आवश्यकता थी जो कि उन्हें शीघ्र ही चन्द्रगुप्त के रूप में प्राप्त हुआ। उस के बाद उन्होंने उस बालक को तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा दी। वहीं पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने शिक्षा के हर क्षेत्र में निपुर्णता प्राप्त की।
एक अन्य विचार के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का बचपन पाटलिपुत्र में बीता और बड़ा होते है वह धनानंद की सेना में भर्ती हुआ और बहुत जल्द परिश्रम करके उनसे एक योग्य स्थान प्राप्त किया। परन्तु वह धनानंद के अत्याचारों से अपनी प्रजा को मुक्त करना चाहता था इस कारण उसने वहा पर धनानंद के खिलाफ एक विद्रोह कि परन्तु धनानंद ने इस विध्रोह को कुचल दिया और इस कारण चन्द्रगुप्त को पाटलिपुत्र छोड़ कर तक्षशिला भागना पड़ा और यह पर उस की मुलाकात चाणक्य से हुई जो कि पहले से ही धनानंद का शत्रु था इसी कारण इन दोनों ने मिल कर नंद वंश का अंत करने का प्रण लिया।
महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय,उनकी शिक्षाएं(Biography of lord Buddha)
साम्राज्य निर्माण के उद्देश्य -चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य निर्माण के मुख्य रूप से दो प्रमुख उद्देश्य थे प्रथम तो यह की वह मगध से नंद साम्राज्य का अंत करना चाहता थाओर दूसरा वह भारत को विदेशी दासता(यवनों) से भए मुक्त करवाना चाहता था। वह अपने जीवन काल में इन दोनों उद्देश्य में सफल रहा। इस कार्य में उसकी सहायता चाणक्य जी ने की।ऐतिहासिक स्रोतों से हमें यह पता चलता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य जी ने सबसे पहले मगध पर आक्रमण किया परन्तु उसके प्रथम आक्रमण में उस निराशा हासिल लगी जिस कारण उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। चन्द्रगुप्त और चाणक्य एक दिन किसी के घर में ठहरे हुए थे। वहा पर एक मां ने अपने बच्चे को खाने में रोटी दी।वह बालक रोटी को किनारों को निकाल रहा था और बीच वाले भाग को निकाला तो उसका हाथ जल गया और उसकी ने तब उस बालक को कहा कि तू तो चन्द्रगुप्त और चाणक्य कि तरह मूर्ख है जो की बिना सीमावर्ती प्रांतों को जीते बिना सीधे मगध पर अधिकार करने चले गए। इस बात को से दोनों बड़े ध्यान से सुन रहे थे।तब उन दोनों को समझ में आ गया की बिना सीमावर्ती प्राणी तो जीते बिना मगध पर अधिकार नहीं किया जा सकता है। इस के बाद उन्होंने अपनी सेना का दोबारा गठन किया और अपने विजय अभियान पर निकाल पड़े। चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रमुख विजय इस प्रकार से है -
1) पंजाब की विजय (Conquest of the Panjaab 322B.C)- चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने विजय अभियान की शरूआत पंजाब से की। पंजाब उस समय विदेशी सत्ता के अधीन था। सिकंदर के जाने के बाद यहां पर अराजकता का माहौल पैदा हुआ था। यहां पर यूनानियों के खिलाफ जनता में असंतोष फैला हुआ था। सिकंदर अभी पंजाब में है था कि उसके प्रमुख अधिकारी निकेटर कि लोगो ने हत्या कर दी। इस के बाद 325 ई पूर्व में उसके एक अन्य अधिकारी फिलिप की भी हत्या हो गई। सिकंदर की मृत्यु 323 ई पूर्व में बेबीलोन में हुई।इस घटना को पाकर उसके सारे अधिकारियों जो कि पंजाब में थे सभी सत्ता को पाने के लिए युद्ध में लग गए।इस घटना का लाभ उठाकर चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने पंजाब के लोगो को इकठ्ठा किया तथा उन्हें यूनानियों के खिलाफ युद्ध करने के लिए तैयार किया। चन्द्रगुप्त मौर्य ने पंजाब पर सुगमता से 322 ई पूर्व में अधिकार कर लिया और वह वहा का राजा बना। इस प्रकार चन्द्रगुप्त पंजाब को विदेशी सत्ता से मुक्त करवाने में सफल रहा।
2)मगध की विजय(Conquest of the Magadha 321B.C)- Panjaab को जितने के पश्चात चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना ध्यान मगध पर दिया मगध उस समय का भारत का सबसे महत्वपूर्ण राज्य था। उस समय मगध का राजा धनानंद था।वह बहुत अत्याचारी शासक था तथा अपने अत्याचारों के कारण लोगो में बदनाम था और दूसरा उसने चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य का भी अपमान किया था।इस कारण उसने मगध पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।परन्तु यह इतना भी आसान नहीं था क्युकी धनानंद के पास बहुत बड़ी सेना थी। फिर भी चन्द्रगुप्त मौर्य ने उस पर 321 ई पूर्व में आक्रमण कर दिया।इस युद्ध में चन्द्रगुप्त मौर्य का साथ प्रवर्तक नमक एक अन्य शासक ने भी दिया।कई इतिहसकारों का मानना है कि प्रवर्तक कोई और नहीं बल्कि राजा पोरस था।
इस युद्ध के संबंध में हमें सही से जानकारी प्राप्त नहीं है परन्तु ऐसा कहा जा सकता है की यह युद्ध बहुत भयानक हुआ होगा।इस युद्ध में भारी संख्या में सैनिक मारे गए। मिलिनपन्हो के अनुसार इस युद्ध में 1 लाख सैनिक,1लाख घोड़े,10हजार हाथी तथा 5 हजार रथवान मारे गए।परन्तु अंत में जीत चन्द्रगुप्त की हुई।इस युद्ध में राजा प्रेवर्तक भी मारे गए।ऐसा कहा जाता है कि इस युद्ध में धनानंद और उसके परिवार के सभी सदस्य मारे गए एक सदस्य बचा जिनकी साधु बन कर जंगलों में चला गया परन्तु चाणक्य ने उसे भए मरवा डाला क्युकी वह नंद वंश का समुल नाश करना चाहता था।परन्तु जैन परंपरा के अनुसार चन्द्रगुप्त ने धनानंद और उसके परिवार वालों को माफ कर दिया और उन्हें राज्य छोड़ने कि अनुमति से दी। यह विजय चन्द्रगुप्त की सब से महत्वपूर्ण विजय थी।इस से उसकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई।
3)सेलीयूकस से युद्ध( war with Seleucus 305BC)- सिकंदर की मृत्यु के के पश्चात उसके सरदारों में सत्ता के लिए गृह युद्ध छिड़ गया। इस गृह युद्ध में अंटनमे Seleuces को सफलता हासिल हुई और वह यूनान का शासक बना।वह सिकंदर की तरह ही महत्वकांशी था।वह सिकंदर के भारत विजय के सपने को साकार करना चाहता था।इसी कारण उसने भारत पर 305BC में हमला कर दिया। परन्तु इस समय भारत की राजनीतिक स्थिति पूर्ण रूप से बदल चुकी थी इस वक्त भारत पर एक योग्य और देश भक्त शासक चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन था ।वह भारत पर किसी विदेशी के आक्रमण को कैसे सहन कर सकता था इसी कारण उसने Seleucus से युद्ध करने की घोषणा कर दी। इन दोनों शासकों के बीच 305 ई पूर्व में एक भयंकर लडाई हुई जिस में चन्द्रगुप्त मौर्य विजई रहा।इस युद्ध के बाद दोनों शासकों के बीच एक समझौता हुआ जिस के अनुसार उस अपनी पुत्री हेलेना का विवाद चन्द्रगुप्त से करना पड़ा और साथ में उसे अपने चार प्रांत काबुल,कंधार, हिरात तथा बलूचिस्तान चन्द्रगुप्त मौर्य को देने पड़े। Seleuces ने मेगस्थनीज को भी चन्द्रगुप्त के दरबार में अपना राजदूत भेजा। बदले में चन्द्रगुप्त मौर्य ने Seleuces को 500 हाथी उपहार में दिए। इस कारण इन दोनों शासकों में मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुए।
4)अन्य सफलताएं -चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी भारत पर अधिकार करने के पश्चात अपना धायान दक्षिण एवं पश्चिम भारत पर दिया।उसने गुजरात, कठियावाड़ और दक्षिण को भी विजीत किया। दक्षिण को चन्द्रगुप्त ने ही जीता था क्युकी अशोक ने केवल कलिंग को जीता ओटी बिन्दुसार ने अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित रखा। इस प्रकार हम का सकते है कि दक्षिण पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने ही अधिकार किया होगा।
इसके अतिरिक्त चन्द्रगुप्त ने अपने जीवन के अतिम दिन दक्षिण भारत में ही बिताए।
साम्राज्य का विस्तार - चन्द्रगुप्त ने अपने जीवन काल में एक बहुत बड़े भाग को जीता था।उसका साम्राज्य भारत में ही नहीं अपितु विदेशो तक फैला हुआ था उसका साम्राज्य उत्तर पश्चिम में हिंदुकुश पर्वत तक फैला था। उत्तर में उसका साम्राज्य हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला था।आधुनिक काबुल ,कंधार, हिरात ,बलूचिस्तान,पंजाब ,उत्तर प्रदेश ,बिहार, गुजरत,कठियावाड़ आदि प्रदेश उसके साम्राज्य के भाग थे। उसकी राजधानी का नाम पाटलिपुत्र था।
मृत्यु - प्राचीन धार्मिक स्रोतों से यह पता चलता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने 24 वर्ष तक शासन किया।अपने शासन के अंतिम दिनों में चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया। इसके कारण उस ने अपना राजपाठ त्याग दिया और एक भिक्षु बन गया।उसने दक्षिण भारत में जा कर के कठोर उपवास किए जिस कारण उसकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि इस महान शासक कि मृत्यु 298 ई पूर्व में हुई थी।
चन्द्रगुप्त मौर्य भारत का प्रथम राष्ट्रीय सम्राट था।उसका व्यक्तित्व बहुत उच्च कोटि का था। इस बात का पता हमें इस बात से लगता है कि उसका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था परन्तु उस ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर एक शक्तिशाली साम्राज्य की नींव डाली। वह भारत का प्रथम ऐसा सम्राट था जिस ने छोटे छोटे राज्यो को इकठ्ठा कर के एक साम्राज्य का निर्माण किया। वह एक महान देश भक्त था जिस ने पंजाब के लोगो को यूनानियों से तथा मगध के लोगो को नंदो से मुक्त करवाया।इसी कारण उसे ,' मुक्तिदाता ' भी कहा जाता है। चन्द्रगुप्त मौर्य प्रकृति का प्रेमी,धर्मपरायण शासक,सहनशील,एक चतुर कूटनीतिज्ञ था।वह अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहता था।वह एक वीर पराक्रमी शासक था। ऐसे महान शासक सदियों में कभी कभी पैदा होते है।चन्द्रगुप्त मौर्य ने लोगो में राष्ट्रीय चेतना और एकता को जगाया था।
मुझे लगता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय आप लोगो को आवश्य ही पसंद आया होगा। अगर आप लोग और किसी शासक के जीवन परिचय पर देखना चाहते है तो Comment करे।
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चन्द्रगुप्त मौर्य
चन्द्रगुप्त मौर्य की गणना भारत के सब से महत्वपूर्ण शासकों में से कि जाती है। यह प्राचीन भारत के एक ऐसे शासक थे जो कि पूरे भारत को एक छत्र शासन के अधीन करना चाहते थे। वे एक महान व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे। वे एक ऐसे शासक थे जो भारत से विदेशी सत्ता का दमन करना चाहते थे।| क्रमांक | जीवन परिचय बिंदु | चन्द्रगुप्त जीवन परिचय |
| 1. | पूरा नाम | चन्द्रगुप्त मौर्य |
| 2. | जन्म | 340 BC |
| 3. | जन्म स्थान | पाटलीपुत्र , बिहार |
| 4. | माता-पिता | नंदा, मुरा |
| 5. | पत्नी | दुर्धरा |
| 6. | बेटे | बिंदुसार
अशोका, सुसीम, विताशोका (पोते)
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चन्द्रगुप्त मौर्य का का जीवन तथा विजये
(Life and Conquests)
1) प्रारंभिक जीवन(early career)-
सिकंदर के आक्रमणों के बाद भारत में राजनीतिक उथल पुथल हुई,जिस के कारण समाज से अराजकता फैल गई। हर तरफ लूट मार का वातावरण उत्पन हो गया। देश वासियों में राष्ट्रीयता की भावना में कमी आई।इसी युग में एक राज वंश की उत्पति हुई जो कि आगे चल कर एक साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ और इस राजवंश का नाम था मौर्य वंश। इस वंश के संस्थापक थे चन्द्रगुप्त मौर्य। परन्तु दुर्भाग्य से चन्द्रगुप्त मौर्य के आरंभिक जीवन के बारे में हमें बहुत थोड़ा ही मालूम है। एक विचार है की चन्द्रगुप्त मौर्य जी मगध के शासक के राजकुमार थे और उनकी माता जी का नाम मुरा था जो कि नीच जाति से संबंधित थी।परन्तु अनेक आधुनिक इतिहासकार उन्हें क्षत्रिय मानते थे।बिन्दुसार तथा अशोक अपने आप को क्षत्रिय कहा करते थे इस प्रकार कहा जा सकता है की चन्द्रगुप्त मौर्य क्षत्रिय था।बौद्ध साहित्य और परंपराओं के अनुसार चन्द्रगुप्त का संबंध सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंश ' मोरिया ' से संबंधित है।जिसका नाम बाद म जा कर के मौर्य पड़ा। इस राजवंश पर किसी अन्य काबिले ने आक्रमण कर दिया और युद्ध में चन्द्रगुप्त के पिता मारे गए ।इसी कारण उनकी माता भाग गई और पाटलिपुत्र में आकर बसने लगी। चन्द्रगुप्त इस समय अपनी माता के गर्भ में था।उसके जन्म के समय ही उसका उसकी माता से विछोह हो गया। बाद में चन्द्रगुप्त एक ग्वाले के पास रहने लगा और बाद में उस ग्वाले ने उस बालक को एक शिकारी को बेच दिया।
चाणक्य से भेंट -
एक दिन चन्द्रगुप्त और उसके साथी जंगल में राजसी खेल खेल रहे थे और वहां पर चाणक्य उन बच्चो को देख रहे थे। चाणक्य चन्द्रगुप्त की प्रतिभा को देख कर हैरान रह गए और उन्होंने चन्द्रगुप्त को उस शिकारी से पैसे देकर मुक्त करवा दिया।
चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय का एक ब्राह्मण था।वह अपने समय का बहुत बड़ा विद्वान था। एक बार वह धनानंद की राजधानी पाटलिुपुत्र में चला गया क्युकी वहा पर धनानंद ब्राह्मणों को धन दे रहा था। चाणक्य वहा पर सबसे आगे वाले स्थान पर बैठ गया। परन्तु धनानंद उस ब्राह्मण के करूप चेहरे को देख कर क्रोधित हो गए और उन्होंने आचार्य चाणक्य को वहा से उठा दिया। इस बात से आचार्य चाणक्य क्रोध में आ गए और उन्होंने इस वंश का अंत करने का प्रण ने लिए। इस काम। के लिए उन्हें एक प्रतिभाशाली बालक कि आवश्यकता थी जो कि उन्हें शीघ्र ही चन्द्रगुप्त के रूप में प्राप्त हुआ। उस के बाद उन्होंने उस बालक को तक्षशिला विश्वविद्यालय में शिक्षा दी। वहीं पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने शिक्षा के हर क्षेत्र में निपुर्णता प्राप्त की।
एक अन्य विचार के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य का बचपन पाटलिपुत्र में बीता और बड़ा होते है वह धनानंद की सेना में भर्ती हुआ और बहुत जल्द परिश्रम करके उनसे एक योग्य स्थान प्राप्त किया। परन्तु वह धनानंद के अत्याचारों से अपनी प्रजा को मुक्त करना चाहता था इस कारण उसने वहा पर धनानंद के खिलाफ एक विद्रोह कि परन्तु धनानंद ने इस विध्रोह को कुचल दिया और इस कारण चन्द्रगुप्त को पाटलिपुत्र छोड़ कर तक्षशिला भागना पड़ा और यह पर उस की मुलाकात चाणक्य से हुई जो कि पहले से ही धनानंद का शत्रु था इसी कारण इन दोनों ने मिल कर नंद वंश का अंत करने का प्रण लिया।
महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय,उनकी शिक्षाएं(Biography of lord Buddha)
चन्द्रगुप्त मौर्य की सिकंदर के साथ भेंट -
यूनानी इतिहासकार Plutarch का कहना है कि चन्द्रगुप्त ने सिकंदर महान से पंजाब में मुलाकात की थी और उसे मगध पर आक्रमण करने की सलाह दी।परन्तु सिकंदर चन्द्रगुप्त के स्वाभिमानी स्वभाव से क्रोधित हुआ और उस ने चन्द्रगुप्त का वश करने का आदेश दिया परन्तु चन्द्रगुप्त किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल रहा।चन्द्रगुप्त की विजय -चन्द्रगुप्त मौर्य ने साम्राज्य का विस्तार बहुत ही कूटनीति से किया। इस कार्य में उसकी सहायता चाणक्य जैसे योग्य विद्वान ने कि। मौर्य साम्राज्य के विस्तार में चन्द्रगुप्त ने महत्वपूर्ण भमिका निभाई। इस के पूर्व भारत अनेक छोटे छोटे राज्यो में विभाजित था।इस समय भारत में राजनीतिक एकता का भी आभाव था।जिसका लाभ यूनानियों ने उठाया और भारत के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। एसी परिस्थिति में चन्द्रगुप्त मौर्य जी बुद्धिमता और अथक परिश्रम से अपने साम्राज्य की स्थापना की।इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य ही प्रथम शासक था जिस ने पूरे भारत को एक सूत्र में बांधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साम्राज्य निर्माण के उद्देश्य -चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य निर्माण के मुख्य रूप से दो प्रमुख उद्देश्य थे प्रथम तो यह की वह मगध से नंद साम्राज्य का अंत करना चाहता थाओर दूसरा वह भारत को विदेशी दासता(यवनों) से भए मुक्त करवाना चाहता था। वह अपने जीवन काल में इन दोनों उद्देश्य में सफल रहा। इस कार्य में उसकी सहायता चाणक्य जी ने की।ऐतिहासिक स्रोतों से हमें यह पता चलता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य जी ने सबसे पहले मगध पर आक्रमण किया परन्तु उसके प्रथम आक्रमण में उस निराशा हासिल लगी जिस कारण उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। चन्द्रगुप्त और चाणक्य एक दिन किसी के घर में ठहरे हुए थे। वहा पर एक मां ने अपने बच्चे को खाने में रोटी दी।वह बालक रोटी को किनारों को निकाल रहा था और बीच वाले भाग को निकाला तो उसका हाथ जल गया और उसकी ने तब उस बालक को कहा कि तू तो चन्द्रगुप्त और चाणक्य कि तरह मूर्ख है जो की बिना सीमावर्ती प्रांतों को जीते बिना सीधे मगध पर अधिकार करने चले गए। इस बात को से दोनों बड़े ध्यान से सुन रहे थे।तब उन दोनों को समझ में आ गया की बिना सीमावर्ती प्राणी तो जीते बिना मगध पर अधिकार नहीं किया जा सकता है। इस के बाद उन्होंने अपनी सेना का दोबारा गठन किया और अपने विजय अभियान पर निकाल पड़े। चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रमुख विजय इस प्रकार से है -
1) पंजाब की विजय (Conquest of the Panjaab 322B.C)- चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने विजय अभियान की शरूआत पंजाब से की। पंजाब उस समय विदेशी सत्ता के अधीन था। सिकंदर के जाने के बाद यहां पर अराजकता का माहौल पैदा हुआ था। यहां पर यूनानियों के खिलाफ जनता में असंतोष फैला हुआ था। सिकंदर अभी पंजाब में है था कि उसके प्रमुख अधिकारी निकेटर कि लोगो ने हत्या कर दी। इस के बाद 325 ई पूर्व में उसके एक अन्य अधिकारी फिलिप की भी हत्या हो गई। सिकंदर की मृत्यु 323 ई पूर्व में बेबीलोन में हुई।इस घटना को पाकर उसके सारे अधिकारियों जो कि पंजाब में थे सभी सत्ता को पाने के लिए युद्ध में लग गए।इस घटना का लाभ उठाकर चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने पंजाब के लोगो को इकठ्ठा किया तथा उन्हें यूनानियों के खिलाफ युद्ध करने के लिए तैयार किया। चन्द्रगुप्त मौर्य ने पंजाब पर सुगमता से 322 ई पूर्व में अधिकार कर लिया और वह वहा का राजा बना। इस प्रकार चन्द्रगुप्त पंजाब को विदेशी सत्ता से मुक्त करवाने में सफल रहा।
2)मगध की विजय(Conquest of the Magadha 321B.C)- Panjaab को जितने के पश्चात चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना ध्यान मगध पर दिया मगध उस समय का भारत का सबसे महत्वपूर्ण राज्य था। उस समय मगध का राजा धनानंद था।वह बहुत अत्याचारी शासक था तथा अपने अत्याचारों के कारण लोगो में बदनाम था और दूसरा उसने चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य का भी अपमान किया था।इस कारण उसने मगध पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।परन्तु यह इतना भी आसान नहीं था क्युकी धनानंद के पास बहुत बड़ी सेना थी। फिर भी चन्द्रगुप्त मौर्य ने उस पर 321 ई पूर्व में आक्रमण कर दिया।इस युद्ध में चन्द्रगुप्त मौर्य का साथ प्रवर्तक नमक एक अन्य शासक ने भी दिया।कई इतिहसकारों का मानना है कि प्रवर्तक कोई और नहीं बल्कि राजा पोरस था।
इस युद्ध के संबंध में हमें सही से जानकारी प्राप्त नहीं है परन्तु ऐसा कहा जा सकता है की यह युद्ध बहुत भयानक हुआ होगा।इस युद्ध में भारी संख्या में सैनिक मारे गए। मिलिनपन्हो के अनुसार इस युद्ध में 1 लाख सैनिक,1लाख घोड़े,10हजार हाथी तथा 5 हजार रथवान मारे गए।परन्तु अंत में जीत चन्द्रगुप्त की हुई।इस युद्ध में राजा प्रेवर्तक भी मारे गए।ऐसा कहा जाता है कि इस युद्ध में धनानंद और उसके परिवार के सभी सदस्य मारे गए एक सदस्य बचा जिनकी साधु बन कर जंगलों में चला गया परन्तु चाणक्य ने उसे भए मरवा डाला क्युकी वह नंद वंश का समुल नाश करना चाहता था।परन्तु जैन परंपरा के अनुसार चन्द्रगुप्त ने धनानंद और उसके परिवार वालों को माफ कर दिया और उन्हें राज्य छोड़ने कि अनुमति से दी। यह विजय चन्द्रगुप्त की सब से महत्वपूर्ण विजय थी।इस से उसकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई।
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| Seleucus |
3)सेलीयूकस से युद्ध( war with Seleucus 305BC)- सिकंदर की मृत्यु के के पश्चात उसके सरदारों में सत्ता के लिए गृह युद्ध छिड़ गया। इस गृह युद्ध में अंटनमे Seleuces को सफलता हासिल हुई और वह यूनान का शासक बना।वह सिकंदर की तरह ही महत्वकांशी था।वह सिकंदर के भारत विजय के सपने को साकार करना चाहता था।इसी कारण उसने भारत पर 305BC में हमला कर दिया। परन्तु इस समय भारत की राजनीतिक स्थिति पूर्ण रूप से बदल चुकी थी इस वक्त भारत पर एक योग्य और देश भक्त शासक चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन था ।वह भारत पर किसी विदेशी के आक्रमण को कैसे सहन कर सकता था इसी कारण उसने Seleucus से युद्ध करने की घोषणा कर दी। इन दोनों शासकों के बीच 305 ई पूर्व में एक भयंकर लडाई हुई जिस में चन्द्रगुप्त मौर्य विजई रहा।इस युद्ध के बाद दोनों शासकों के बीच एक समझौता हुआ जिस के अनुसार उस अपनी पुत्री हेलेना का विवाद चन्द्रगुप्त से करना पड़ा और साथ में उसे अपने चार प्रांत काबुल,कंधार, हिरात तथा बलूचिस्तान चन्द्रगुप्त मौर्य को देने पड़े। Seleuces ने मेगस्थनीज को भी चन्द्रगुप्त के दरबार में अपना राजदूत भेजा। बदले में चन्द्रगुप्त मौर्य ने Seleuces को 500 हाथी उपहार में दिए। इस कारण इन दोनों शासकों में मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुए।
4)अन्य सफलताएं -चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी भारत पर अधिकार करने के पश्चात अपना धायान दक्षिण एवं पश्चिम भारत पर दिया।उसने गुजरात, कठियावाड़ और दक्षिण को भी विजीत किया। दक्षिण को चन्द्रगुप्त ने ही जीता था क्युकी अशोक ने केवल कलिंग को जीता ओटी बिन्दुसार ने अपने पिता के साम्राज्य को सुरक्षित रखा। इस प्रकार हम का सकते है कि दक्षिण पर चन्द्रगुप्त मौर्य ने ही अधिकार किया होगा।
इसके अतिरिक्त चन्द्रगुप्त ने अपने जीवन के अतिम दिन दक्षिण भारत में ही बिताए।
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| चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य |
साम्राज्य का विस्तार - चन्द्रगुप्त ने अपने जीवन काल में एक बहुत बड़े भाग को जीता था।उसका साम्राज्य भारत में ही नहीं अपितु विदेशो तक फैला हुआ था उसका साम्राज्य उत्तर पश्चिम में हिंदुकुश पर्वत तक फैला था। उत्तर में उसका साम्राज्य हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला था।आधुनिक काबुल ,कंधार, हिरात ,बलूचिस्तान,पंजाब ,उत्तर प्रदेश ,बिहार, गुजरत,कठियावाड़ आदि प्रदेश उसके साम्राज्य के भाग थे। उसकी राजधानी का नाम पाटलिपुत्र था।
मृत्यु - प्राचीन धार्मिक स्रोतों से यह पता चलता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने 24 वर्ष तक शासन किया।अपने शासन के अंतिम दिनों में चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया। इसके कारण उस ने अपना राजपाठ त्याग दिया और एक भिक्षु बन गया।उसने दक्षिण भारत में जा कर के कठोर उपवास किए जिस कारण उसकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि इस महान शासक कि मृत्यु 298 ई पूर्व में हुई थी।
चन्द्रगुप्त मौर्य का चरित्र या व्यक्तित्व(Character of Chandragupt Maurya)
चन्द्रगुप्त मौर्य भारत का प्रथम राष्ट्रीय सम्राट था।उसका व्यक्तित्व बहुत उच्च कोटि का था। इस बात का पता हमें इस बात से लगता है कि उसका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था परन्तु उस ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर एक शक्तिशाली साम्राज्य की नींव डाली। वह भारत का प्रथम ऐसा सम्राट था जिस ने छोटे छोटे राज्यो को इकठ्ठा कर के एक साम्राज्य का निर्माण किया। वह एक महान देश भक्त था जिस ने पंजाब के लोगो को यूनानियों से तथा मगध के लोगो को नंदो से मुक्त करवाया।इसी कारण उसे ,' मुक्तिदाता ' भी कहा जाता है। चन्द्रगुप्त मौर्य प्रकृति का प्रेमी,धर्मपरायण शासक,सहनशील,एक चतुर कूटनीतिज्ञ था।वह अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहता था।वह एक वीर पराक्रमी शासक था। ऐसे महान शासक सदियों में कभी कभी पैदा होते है।चन्द्रगुप्त मौर्य ने लोगो में राष्ट्रीय चेतना और एकता को जगाया था।
मुझे लगता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन परिचय आप लोगो को आवश्य ही पसंद आया होगा। अगर आप लोग और किसी शासक के जीवन परिचय पर देखना चाहते है तो Comment करे।







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